शराब नहीं…शराबियत …. यानी अल्कोहलिज़्म…!

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शराब नहीं...शराबियत .... यानी अल्कोहलिज़्म...!

आदत जिसको समझे हो
वो मर्ज कभी बन जायेगा
फिर मर्ज की आदत पड़ जाएगी
अर्ज ना कुछ कर पाओगे
गर तब्दीली की गुंजाइश ने
साथ दिया तो ठीक सही
पर उसने भी गर छोड़ दिया
तो यार बड़े पछताओगे….

जो बूँद कंही बोतल की थी
तो साथ वहीं दो पल का था
फिर पता नहीं कब दो पल का वो
साथ सदी में बदल गया…
हम चुप्प बैठके सुन्न गुजरते
लम्हे को ना समझ सके
वो कब भीगी उन पलकों की
उस सुर्ख नमी में बदल गया…
और नींद ना जाने कहाँ गई
उन सहमी सिकुड़ी रातों में
हम सन्नाटे को चीर राख़ से भरा
अँधेरा तकते थे…
फिर सिहर-सिहर फिर काँप-काँप के
थाम कलेजा हाथों में
जिसको ना वापिस आना था
वो गया सवेरा तकते थे….
जिसको समझे हो तुम मजाक
वो दर्द कभी बन जायेगा
फिर दर्द की आदत पड़ जाएगी
अर्ज ना कुछ कर पाओगे….
गर तब्दीली की गुंजाइश ने
साथ दिया टी ठीक सही
पर उसने भी गर छोड़ दिया
तो यार बड़े पछताओगे…

कट-फट के हम बिखर चुके थे
जब तुम आये थे भाई
और सभी रास्ते गुजर चुके थे
जब तुम आये थे भाई…
वो दौर ना तुमने देखा था
वो किस्से ना सुन पाए थे
जिस दौर की आंधी काली थी
जिस दौर के काले साये थे…
उस दौर नशे में ज़ेहन था
उस दौर नशे में ये मैं था
उस दौर पेशानी गोली थी
उस दौर पसीने में तन था…
उस दौर में सपने डर लाते
उस दौर दोपहरी सन्नाटा
उस दौर सभी कुछ था भाई
और सच बोलें कुछ भी ना था…
ये नरम सुरीला नग़मा कड़वी
तर्ज कभी बन जायेगा
फिर तर्ज की आदत पड़ जाएगी
अर्ज ना कुछ कर पाओगे…
गर तब्दीली की गुंजाइश ने
साथ दिया तो ठीक सही
पर उसने भी गर छोड़ दिया तो
यार बड़े पछताओगे…

उस दौर से पहले दौर रहा
जब साथ ज़िन्दगी रहती थी
वो दौर बड़ा पुरजोर रहा
जब साथ बंदगी रहती थी…
जब साथ कहकहों का होता
जब बात लतीफो की होती
और शाम महकते ख्वाबों की
और रात हसीनों की होती…
जब कहे नाज़नीं बोलो साजन
कौन पहर को आऊं मैं
और हुस्न कहे की तू मेरा
और तेरा हो हो जाऊं मैं…
बस मैं पागल ना समझ स्का
किस और तरफ को जाना है
बस जाम ने खींचा, बोतल इतराई
की तुझको आना है…
मैं मयखाने की और चला
ये भूल के पीछे क्या होता
इक नन्हा बचपन सुन्न हिचकियाँ
अटक-अटक के जा रोता…
इक भरी जवानी कसक मार के
चुप चुप बैठी रहती है
और खामोशी से ‘खा लेना कुछ’
नाम आँखों से कहती है…
उन सहमी सिसकी रातों को मैं
उन पल्लू ठुंसी फफक फफकती
बातों में ना अटक सका…
ये कभी कभार का काम
अटुटा फ़र्ज की आदत पड़ जाएगी
अर्ज ना कुछ कर पाओगे…
गर तब्दीली की गुंजाइश ने
साथ दिया तो साथ सही
पर उसने भी गर छोड़ दिया तो
यार बड़े पछताओगे…

वो पछतावे के आंसू भी
मैं साथ नहीं ला पाया था
उन जले पुलों की क्या बोलूँ
जो जला जला के आया था…
वो बोलें थे की देखो इसको
जर्द-सर्द इंसान है ये
इक ज़िंदा दिल तबियत में बैठा
मुर्दा दिल हैवान है ये…
मैं शर्मसार तो क्या होता
मैं शर्म जला के आया था
उस सुर्ख जाम को सुर्ख लार में
नहला कर के आया था…
मैं आँख ली लाली साथ लहू
मदहोश कहीं पे रहता था
खूंखार चुटकुले तंज लतीफे
बना-बना के कहता था…
ये दर्द को सहने का झूठा
हमदर्द की आदत पड़ जाएगी
अर्ज ना कुछ कर पाओगे…
गर तब्दीली की गुंजाइश ने
साथ दिया तो ठीक सही
पर उसने भी गर छोड़ दिया तो
यार बड़े पछताओगे…

                                                                                                       लेखन “पीयूष मिश्रा”

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